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कर्मयोग के पथ पर चलने के लिए गीता का अध्ययन जरूरी।


कर्मयोग के पथ पर चलने के लिए गीता का अध्ययन जरूरी:
नेमवि में त्रिदिवसीय श्रीमद भगवद्गीता जयंती का शुभारम्भ
ललितपुर। संस्कृत भारती एवं संस्कृत विभाग नेहरू महाविद्यालय ललितपुर के संयुक्त तत्वाधान में त्रिदिवसीय श्रीमद भगवदगीता जयन्ती महोत्सव का आज शुभारम्भ किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ नेहरू महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अवधेश अग्रवाल एवं संस्कृत विभागाध्यक्ष डा. ओमप्रकाश शास्त्री ने दीप प्रज्जवलन एवं राष्ट्रीय धर्मशास्त्र श्रीमद भगवदगीता के पूजन के साथ किया। 
प्रथम दिवस छात्र/छात्राओं की श्लोक वाचन प्रतियोगिता एवं वर्तमान समय में श्रीमद्भगवद्गीता की प्रासंगिकता विषय पर छात्र/छात्राओं की भाषण प्रतियोगिता आयोजित की गई। इस अवसर पर प्राचार्य डॉ. अवधेश अग्रवाल ने कहा कि गीता ज्ञान को आत्मसात कर जीवन पथ पर आगे बढऩे वाले मनुष्य हर क्षेत्र में सफलता अर्जित करते हैं जबकि गीता रहस्य को न मानने वाले व्यक्ति पग-पग पर हार का सामना करते हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को सत्य की रक्षा के लिए गीता का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। उन्होंने कहा कि भगवद्गीता का विश्व चिन्तन में बड़ा महत्व है। गीता जीवन पथ पर कर्म करने की शिक्षा देती है। मनुष्य को निरन्तर कर्म करते रहना चाहिये। इससे ही उसे सच्ची शांति व सुख प्राप्त होता है।
संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए संस्कृत विभागाध्यक्ष डा. ओमप्रकाश शास्त्री ने कहा कि गीता मनुष्य को कर्मयोग के पथ पर चलना सिखाती है। गीता जीवन और संसार की चुनौतियों से सामना करने का संदेश देती है। गीता विश्व का महान ग्रंथ है। गीता युद्ध के लिए ही नहीं अपितु शंाति के लिए उपयोगी है। उन्होंने कहा कि गीता के उपदेशों को आत्मसात कर जीवन की अनेक व्याधियों से आसानी से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है
शिक्षाविद जयशंकर प्रसाद द्विवदी ने कहा कि आज युवा पीढ़ी को विद्वान आचार्यो से गीता के ज्ञान को ग्रहण कर संस्कार एवं संस्कृति को सीखना चाहिये। जिससे वे अपने जीवन में सफलता प्राप्त करेंगे। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि सम्पूर्ण राष्ट्र में गीता ज्ञान का प्रसार किया जाये, जिससे सम्पूर्ण देश के निवासियों में राष्ट्र प्रेम, देशभक्ति एवं कर्तव्य परायणता की भावना विकसित हो सके। 
कृषि संकायाध्यक्ष डॉ. हरीश चंद्र दीक्षित ने कहा कि भौतिकता के घनघोर अंधकार में भटकती मानव जाति के उद्धार के लिए गीता का आलोक ही एक मात्र उपाय है। इसका गंभीर अध्ययन तथा उसके संदेश का परिचालन व्यक्ति एवं समाज तथा मानवता की रक्षा करने में समर्थ है। 
संस्कृत प्रवक्ता डॉ. दीपक पाठक ने कहा कि भारतीय दर्शन में धर्म को एक जीवन पद्धति माना गया है। धर्म प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। युद्ध शस्त्रों से नहीं होता है, वैचारिक भी होता है। हमारे अंर्तमन में द्वंद होता है। उस द्वंद में गीता ही हमारा मार्गदर्शन कर सकती है। गीता जीवन को सुधारने का ग्रंथ है। 

इस अवसर पर डॉ. अनिल सूर्यवंशी, डॉ. हरीश चंद्र दीक्षित, डॉ. सुभाष जैन, डॉ. संजीव शर्मा, डॉ. सुधाकर उपाध्याय, डॉ. दीपक पाठक, डॉ. रामकुमार रिछारिया, डॉ. शैलेन्द्र सिंह चैहान, डॉ. प्रीति सिरौठिया, डॉ. सूबेदार यादव, डॉ. अरिमर्दन सिंह, डॉ. ओमप्रकाश चैधरी, डॉ. राजेश तिवारी, डॉ. अवनीश त्रिपाठी, डॉ. विनीत अग्निहोत्री, डॉ. ऊषा तिवारी, डॉ संतोष सिंह, डॉ. जगत कौशिक, डॉ. लक्ष्मीकान्त मिश्रा, डॉ. जगवीर सिंह, संदीप श्रीवास्तव, प्रीतम सिंह राजपूत आदि मौजूद रहे।

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