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पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का पर्व है पितृपक्ष एवं सोलह श्राद्ध ।

तर्पण एवं श्राद्ध कर्म से पूर्वजों की आत्मा को मिलती है शांति देते हैं आशीर्वाद।
रमेश श्रीवास्तव ललितपुर । कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा के दिन से सोलह दिनों तक चलने वाले हिन्दू धर्म के  बहुत ही प्राचीन पर्व पितृ पक्ष सोलह श्राद्ध की भाद्र पद की पूर्णिमा के दिन से सुरुआत हो चुकी है इस अवसर पर हिन्दू धर्म के लोग अपने पूर्वजों  पितरों की शांति के लिए तर्पण और पिण्ड दान आदि कर्म कांड  करके इस पर्व को मनाते हैं यह हिन्दू धर्म का बहुत ही प्राचीन तम पर्व है जो बड़े पैमाने पर मनाया जाता है इसे पितृ पक्ष के साथ साथ सोलह श्राद्ध के पर्व के नाम से भी जाना जाता है सनातन धर्म में यैसी मान्यता है की जिन परिजनों का देहांत हो चुका है उन्हें पितर  कहा जाता है ।

सनातन धर्म में पितृ पक्ष का बड़ा महत्व है यह सबसे लम्बी अवधि तक चलने वाला पर्व है जिसमें मास मदिरा आदि का सेवन वर्जित है साथ ही नियम संयम एवं ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए  पितरों को आमंत्रित कर अन्न जल समर्पित कर  पिण्ड दान एवं श्राद्ध  किया जाता है । मान्यता है की इस अवधि में देव स्वरुप पितरों को देवलोक से धरती पर आते हैं  और इस अवधि में उन्हें अपने परिवार के बीच रहने का मौका मिलता वह अपने परिजनों के हाथों से ही अन्न एवं जल ग्रहण करते हैं पितृ पक्ष में बड़े पैमाने पर पिण्ड दान एवं श्राद्ध कर्म किए जाते हैं कहा जाता है तर्पण आदि से प्रसन्न एवं तृप्त होकर पितर अपने कुटुंबियों को आशीर्वाद देकर जाते हैं जिससे परिवार में सुख एवं संपदा आति है । शास्त्रों के अनुसार जो ब्यक्ति इस पर्व को नहीं मानता उसे पितृ दोष का सामना करना पड़ता है ज्योतिष के अनुसार जिस व्यक्ति के जीवन में पितृ दोष होता है उसे तमाम प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है ।

पितृ पक्ष में तिल और कुशा का होता है महत्त्व ।
 
सैदपुर निवासी लक्ष्मी नारायण शास्त्री का कहना है की पितृ पक्ष में तिल और कुशा का बड़ा महत्व है दोनों भगवान को प्रिय है कुशा के अग्रभाग देवताओं का मध्य मनुष्य का एवं जड़ें पितरों की मानी जाती है बिना तिल और कुशा के तर्पण अधूरा माना जाता है इस अवधि में लोग  प्रातः काल अपने अपने क्षेत्र के नदी तालाब, बांध एवं अन्य जल स्रोंतों पर पहुंच कर तिल कुशा जवां पुष्प आदि के साथ जलांजलि देकर तर्पण कर ते है तो वहीं ज्यादातर लोग पहले दिन नदी तालाबों में तर्पण करने के बाद से अपने घर में ही तर्पण करते हैं पितृ मोक्ष अमावस्या के दिन पितृ परलोक लौट जाते हैं पितृ भगवान विष्णु के स्वरुप माने गये इसी के साथ ही पितृ पक्ष एवं सोलह श्राद्ध पर्व का समापन हो जाता है। इस अवधि में दान पुण्य एवं ब्राह्मणों को भोजन कराने एवं गाय काग स्वान आदि को भोजन खिलाने से पुण्य लाभ मिलता है ।

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