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धूमधाम से मनाया गया रक्षाबंधन का पर्व ।

 

बहनों ने भाई की कलाई में बांधा प्यार, भाईयों ने दिए उपहार ।
भाइयों ने लिया बहनों की रक्षा का संकल्प।

ललितपुर: (रमेश श्रीवास्तव) । प्यार, स्नेह एवं भाई बहन के रिश्ते की डोर को मजबूत करने का पर्व रक्षाबंधन आज पूरे जनपद में श्रद्धा के मनाया गया। इसको लेकर भाई-बहनों में जबरदस्त उत्साह का माहौल देखने को मिला। बहने अपने भाई की कलाई पर स्नेह की डोर बाँध के लिए विभिन्न प्रकार की राखियाँ खरीदने में मशगूल है। साथ ही इसे लेकर तरह-तरह के कार्यक्रम भी बना रही है। एक तरफ जहाँ तमाम बहनों में अपने भाई की कलाई पर प्रेम की डोर बाँधने पर उत्साह है। रक्षाबंधन पर्व के मद्देनजर बाजारों में राखियों की दुकानें खूब सजी है। बच्चों को आकर्षित करने वाली खास वैराइटियाँ आई है, जबकि बड़े-बुजुर्ग धागों और डोरियो पर जोर दे रहे हैँ। दूसरी तरफ रक्षाबंधन पर मुंह मीठा कराने के लिए मिठाई की दुकानें भी खूब सजी देखी गई। पर्व को लेकर बाजार में काफी रौनक देखी गयी। सड़क किनारे तख्त और टेट लगाकर दुकानें सजाई गई है। देर रात तक खुली रहने वाली इन दुकानों में काफी भीड़ उमड़ी। बाजार में हर प्रकार की राखियाँ उपलब्ध देखी गई, ताकि व्यक्ति अपनी जरूरत के मुताबिक उन्हे खरीद सके। महगाई का असर तो राखियों के दाम पर भी है, लेकिन बिक्री पर कोई असर नहीं हुआ है।
जनपद भर में रक्षाबंधन के पर्व पर युवतियाँ अपनी सहेलियों या फिर अभिभावकों के साथ जोर-शोर से राखी खरीदती देखी गई है। सैदपुर अपने भाइयों को राखी बांधने आयी राजकुमारी मलखान पाल ने कहा कि वह प्रत्येक वर्ष अपने भाई को राखी बाँधती है और बदले में उसने अच्छा उपहार लेती है। नूतन पाल राधिका ने बताया कि मेरे सगे भाई नही है पर में अपने बड़े पापा के पुत्र राजआर्यन पाल, सौरभ पाल सचिन,दीपक, सोनू,रितिक को वह पूरी सादगी के साथ राखी बाँधती है, मुझे मेरे भाई खूब प्यार करते है,मुझे सगी बहिन से ज्यादा मानते है,आजतक मुझे यह एहसास नही हुआ कि मेरे सगे भाई है कि बड़े पापा के। रोशनी धनगर ने कहा कि में अपने सगे भाइयो के साथ साथ में बड़े पापा के तीनों पुत्रो को अपने भाइयों से ज्यादा मानती हूं और उनको ही सबसे पहले रखी बांधती हु। राखी पर्व को लेकर एक तरफ जहाँ तमाम बहनों में उत्साह व खुशी है, वहीं कुछ ऐसे भाई-बहिन भी है, जिनके लिए यह पर्व कोई महत्व नहीं रखता।


क्यों मनाया जाता है रक्षाबंधन पर्व: 
रक्षाबंधन दूसरे की रक्षा करने के साथ-साथ आत्मरक्षा करने की प्रेरणा भी देता है। यही कारण है कि इसे महाभय को दूर करने वाला विष तोड़क पर्व भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार यम को उसकी बहन इंद्राणी ने रक्षा सूत्र बाधा था, जो आगे जाकर परपरा बन गई। इसलिए कहा जा सकता है कि राखी सिर्फ हिन्दुओं का त्यौहार न होकर सभी मजहबों व धर्माें में भाई व बहन के प्यार के अटूट बंधन को निभाने वाला पर्व है, परम्परा है। जब मध्यकालीन युग राजपूतों एवं मुस्लिमों के बीच युद्ध चल रहा था। रानी कर्मवती चित्तौड़ के राजा की विधवा थी। गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी कर्मवती ने मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजी और रक्षा का वचन लिया। हुमायूँ ने भी रानी के द्वारा भेजी गई राखी की लाज रखते हुए उनकी रक्षा कर उन्हे मुंहबोली बहन का दर्जा दिया। एक अन्य कथानक के अनुसार युद्ध के दौरान जब शिशुपाल कृष्ण के हाथों मारा जाता है, तो कृष्ण के बाएँ हाथ की अंगुली से खून बहता देख द्रोपदी बेहद दुखी होती है और वह अपने साड़ी के पल्लू को फाड़ कर कृष्ण के अंगुली में बाँध देती है तभी कृष्ण द्रोपती को अपनी बहन मान लेते है, और भरी सभा में जब द्रोपदी का चीरहरण होता है, तब कृष्ण अपने भ्रातधर्म का मान रखते हुए उसकी लाज बचाते है।

       कैसे मनाया गया रक्षाबंधन:
प्रात: शुभ मुहूर्त में लड़कियाँ पूजा की थाली सजा कर। थाली में राखी के साथ रोली या हल्दी, कुमकुम, चावल, दीपक मिठाई रखती है। भाई तैयार होकर पूजा स्थल पर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठे। पहले अभीष्ट देवता की पूजा करे। इसके बाद बहनें भाई को कुमकुम, हल्दी, अक्षत का टीका करके सिर पर चावल छिड़कती है। बहनें उत्तर दिशा की ओर मुंह करके भाई की आरती उतारती है। इसके बाद दाहिने हाथ की कलाई में रक्षा सूत्र बाँध करके भगवान से पूर्ण रक्षा की कामना करती है। भाई बहन को उपहार पैसे आदि देकर इस बन्धन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रकट है। साथ ही उम्रभर रक्षा का वचन देता है।

        किसको बांधी राखी : 
राखी कच्चे सूत्र के अलावा रगीन कलावा, रेशमी धागा और सोने-चाँदी जैसी महगी बस्तु भी बांधी गई है। सामान्यत: राखी बहनें भाई को बाँधती है। परन्तु ब्राह्मणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों जैसे बेटी पिता को राखी बांधती देखी गई है। सार्वजनिक रूप से नेताओ एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी राखी बाँधी गई है। प्रकृति के संरक्षण के लिए वृक्षों को भी राखी बाँधी गई है। जैन धर्मावलम्बियों को मन्दिरों में पुजारी, रक्षक या समाजश्रेष्ठियों द्वारा राखी बाँधी गई है।

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